Monday, December 23, 2019

My Golden Time

My Golden Time,
My Favorite Time,
  
Was with You my darling!!!!

When there was none only you,
When I could speak everything true,
When we were not two ,My darling!!!
  
My Golden Time..


When I was enjoying every moment,
When I was living in a heaven ,
When we were in the Hands of each other , My darling!!!


My Golden Time

Monday, September 30, 2019

ज़िन्दगी है तो ख्वाब है

ज़िन्दगी है तो ख्वाब है
ख्वाब है तो मंज़िले है
मंजिलें  है तो रास्ते है
रास्ते है तो मुश्किलें है
मुश्किलें है तो ज़ज्बा है
जज़्बा है तो संघर्ष है
संघर्ष है तो सफलता है
सफलता है तो असफलता है
असफलता है तो निराशा है
निराशा है तो उदासी है
उदासी है तो बेचैनी है
बेचैनी है तो थकान है
थकान है तो नींद है
नीदं है तो ख्वाब है
खवाब है तो ज़िन्दगी है


Tuesday, September 17, 2019

कुछ बातें

कुछ बातें तुमसे करनी थी
कुछ शिकायते भी बाकी थी
कुछ बिना कहे कुछ बिना सुने
जाने किधर तुम चली गई

अभी देखा नहीं था जी भर के
अभी जाना नहीं था मन भर के
क्यों जीवन की दोपहर  को
तुम शाम बना कर चली गई

कुछ बातें  ..

अब बसंत आने वाला था
तेरी दुआओं  का अब असर होने वाला था
क्यों आषाढ़ की गर्मी मे
तुम सावन देकर चली गयी


कुछ बातें   ......

सात जन्म के वादे किये थे
ये जन्म तो पूरा निभाना था....
क्यों मुझको अकेला छोड़ के
तुम स्वर्ग भ्रमण  को चली गयी

कुछ बातें 

Friday, August 23, 2019

मुश्किल है अपना मेल प्रिये

मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं है खेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं है खेल प्रिये
तुम MA फर्स्ट डिविजन हो, मैं हुआ मेट्रिक फेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं है खेल प्रिये
तुम फौजी अफसर की बेटी, मैं तो किसान का बेटा हूं
तुम रबड़ी खीर मलाई हो, मैं तो सत्तू सपरेटा हूं
तुम AC घर में रहती हो, मैं पेड़ के नीचे लेटा हूं
तुम नई मारुती लगती हो, मैं स्कूटर लम्ब्रेटा हूं
इस कदर अगर हम छुप छुप कर, आपस में प्यार बढ़ाएंगे
तो एक रोज तेरे डेडी, अमरीश पुरी बन जाएंगे
सब हड्डी पसली तोड़ मुझे वो भिजवा देंगे जेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं है खेल प्रिये
तुम अरब देश की घोड़ी हो, मैं हूं गदहे की नाल प्रिये
तुम दीवाली का बोनस हो, मैं भूखों की हड़ताल प्रिये
तुम हीरे जड़ी तश्तरी हो, मैं एल्युमिनियम का थाल प्रिये
तुम चिकन सूप बिरयानी हो, मैं कंकड़ वाली दाल प्रिये
तुम हिरन चौकड़ी भरती हो, मैं हूं कछुए की चाल प्रिये
तुम चंदन वन की लकड़ी हो, मैं हूं बबूल की छाल प्रिये
मैं पके आम सा लटका हूं मत मारो मुझे गुलेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं है खेल प्रिये
मैं शनि देव जैसा कुरूप, तुम कोमल कंचन काया हो
मैं तन से मन से कांशीराम, तुम महा चंचला माया हो
तुम निर्मल पावन गंगा हो, मैं जलता हुआ पतंगा हूं
तुम राज घाट का शांति मार्च, मैं हिन्दू-मुस्लिम दंगा हूं
मैं ढाबे के ढांचे जैसा, तुम पांच-सितारा होटल हो
मैं महुए का देसी ठर्रा, तुम ‘रेड लेबल’ की बोतल हो
तुम चित्रहार का मधुर गीत, मैं कृषि दर्शन की झाड़ी हूं
तुम विश्व सुन्दरी सी कमाल, मैं तेलिया-छाप कबाड़ी हूं
तुम सोनी का मोबाइल हो, मैं टेलीफोन वाला चोगा
तुम मछली मनसरोवर की, मैं हूं सागर तट का घोंघा
दस मंजिल से गिर जाऊंगा, मत आगे मुझे धकेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं है खेल प्रिये
मुझको रेफ्री ही रहने दो, मत खेलो मुझसे खेल प्रिये
मुश्किल है अपना मेल प्रिये, ये प्यार नहीं है खेल प्रिये
Dr Sunil Jogi

पिता

जब भी मैं थक जाता हूँ
दिनचर्या  की छोटी मोटी बातों से
जब मेरा मन भर आता है
रोज रोज के मानसिक तनावों से
जब भी लगता है मुझे की बहुत कुछ
नामुमकिन है

या

जब मैं हार जाता हूँ
कोशिश करते करते
आशा तृष्णा हावी हो जाती है
जब मुझ पे
मेरा लालच बन बैठता है
जब मेरा खुदा


तब मैं सोचता हूँ मेरे पिता के बारे मैं
जो आज तक नहीं थके है
चल रहे है छोटी छोटी बातों को संभाले

मैं सोचता हूँ उनकी मानसिक ढृढ़ता को
नामुमकिन को मुमकिन  करने को
कभी ना हार मानने को
ईमानदारी से जो मिले उसे पाने को
संतुष्टि से जीवन बिताने को। .....

Pradeep Dewani ~pd

Saturday, July 13, 2019

पक्की क्यों होती है

ये कच्ची उम्र की मोहबत। . इतनी पक्की क्यों होती है 

ना धर्म ना जात , ना रंग 
ना उम्र का लिहाज़ 
उन आंसुओं की रंगत इतनी अच्छी क्यों होती है ,,


ना छुरी ना चाकू , न बन्दूक 
फिर भी दिल पे वार ,उन कातिलों की सोहबत 
इतनी सच्ची क्यों होती है 

ये कच्ची उम्र की मोहबात  .. इतनी पक्की क्यों होती है 

ना वक्त , ना पैसा , ना राह ,
ना ही मंजिल का गुमान ,फिर भी सब कुछ पाने की,
कोशिश क्यों होती है ।

ये कच्ची उम्र की मोहबात .. इतनी पक्की क्यों होती है 

उम्मीद , ख्वाब , और जज्बातों ,
के सहारे  चलती है वो दुनिया ,
उसी उम्र में सच्ची मोहब्बत क्यों होती है ।

ये कच्ची उम्र की मोहबात .. इतनी पक्की क्यों होती है 
प्रदीप देवानी ~pd

Tuesday, June 25, 2019

रास्ता या मंजिल

 जन्म लेते ही हम सब का एक  सफर शरू हो जाता है।

हमारे सफर के अपने अपने साथी होते है , अपने अपने दोस्त और अपने अपने दुश्मन भी होते है।

हम सब के सफर की गति भी अलग अलग होती है ,  और इस लाजवाब सफर के लिए हम सबको अलग अलग टिकट भी मिला है जो हम सबको एक  मंजिल तक अलग अलग रास्तों से पहुँचता है।

बस फर्क ये है किसी को ट्रैन का जनरल टिकट तो किसी को प्लेन का बिज़नेस क्लास टिकट मिला हुआ है।

 इस सफर की खास बात ये है की हमारे पास टिकट अपग्रेड और डाउन ग्रेड का भी मौका है।  हम अपने कर्मों से टिकट तो अपग्रेड  या डाउन ग्रेड करवा सकते है


हम सबके सफर की मंजिल एक ही है चाहे हमारे पास किसी भी तरह का  टिकट हो। रास्ता अलग अलग होगा पर मंजिल एक। 

इस सफर का जो भी टिकट आपके पास है उसका लुफ्त उठाये , किसी का टिकट अपग्रेड करने मे  अगर मदद कर सकते है तो करे , कभी अपना टिकट डाउन ग्रेड हो जाये तो घबराये नहीं , क्युकी मंजिल तो एक ही है,  नए दोस्त बनाये , जो गीले शिकवे  है वो मिटाये।

लेकिन हम सब की वो कॉमन मंजिल है क्या ?

जो हम सब की कॉमन  मंजिल है वो है मौत , जहाँ हम सब को पहुँचना है और इस मंजिल का हम कभी लुफ्त नहीं उठा पाएंगे, इसलिए जितना हो सके इस सफर का लुफ्त उठाये , रास्ते का लुफ्त उठाये।

अगर स्लीपर मैं है तो उसका भी और बिज़नेस क्लास मैं है तो उसका भी , बिना ये सोचे हुए की मेरी टिकट ये क्यों है ? मेरी टिकट कब अपग्रेड होगी ? उसकी अपग्रेडेड क्लास मे  इतनी सुविधा क्यों है ?

क्यूंकि मंजिल तो सबकी एक ही है चाहे वो किसी भी क्लास में सफर कर रहा हो।

इसलिए रास्ते का लुफ्त उठाये क्यूंकि मंजिल का लुफ्त उठा नहीं पाएंगे ,  ज़िन्दगी एक सफर है  मंजिल नहीं।  




Thursday, June 20, 2019

प्यार

अगर लोग मुझे पागल नहीं कहते
तो मेरे प्यार करने का कोई मतलब नहीं है 

Thursday, May 9, 2019

मेरे सपने

बाग़ मैं बैठी एक तितली की तरह
खूबसूरत , रंगीन  और लाजवाब है मेरे सपने

छूने जाऊं तो
घबराकर , उड़ जाते है मेरे सपने

मुठी मैं जकड कर
जब पकड़ा तो मरने लगते  है मेरे सपने



Thursday, April 4, 2019

अजनबी शहर

तेरी पनाह मे रहना अच्छा लगता है
तेरा रूप रंग नैन नक़्श बाता है
तेरा  चाल चलन भी चंगा भला है

बारिश की बूंदे जब तुझे नहलाती है
तो तेरा बदन फ़िज़ा मैं खुश्बू फैला देता है

तुझे और गहराई से जानना , पहचानना,
अच्छा लगता है

तूने गहरे पानी मे
समां जाने की बजाये तैरना सिखाया  है

चलना सिखाया है तूने बिना रुके
बिना थके सहयाद्रि के ऊँचे पहाड़ो  पे

पर ये सब होते हुए भी तुझसे
प्यार हो  है ऐ मेरे अजनबी शहर

तू मेरा होके  भी अजनबी है ए  मेरे पुणे शहर


Friday, March 1, 2019

भूत और भविष्य

भूत और भविष्य  के द्वंद में  फँसा  हुआ
चल रहा हूँ  बिना रुके  बिना थके मगर कहाँ ?

भूत  तो चला गया छोड़ मुझको  राह में
भविष्य की महबूबा तो आती नहीं कभी हाथ  में

वर्तमान चल रहा है कंधे से कंधा मिला
क्यों नहीं  मानता मैं उसको मेरी दिलरुबा ?




जानता हूँ मैं ये की
वर्तमान सिर्फ संग है
वर्तमान ही मेरे  जीने की उमंग है


उलझ रहा है अपनी ही पतंग की डोर  में
रात दिन
माया के जंजाल  में  है बुरी तरह फसा हुआ 

Monday, January 21, 2019

कुछ दम

वो पूछती है की इतने हैरान परेशान क्यों हो 
एक पल को सोचा बताऊँ  फिर टाल दिया 

पर वो पढ़ लेती मेरे चहरे  की शिकन को 
और मेरी आँखों  की हैरत को 

जिक्र ना किया कुछ मैंने 
मेरे ग़म - ए - शब् की बातों का 

उस बात को क्यों छेड़ू  मैं 
जिस बात का कुछ हल ना हो 

उस बात को क्यों छेड़ू मैं 
जिस बात मे  कुछ दम ना हो 

तू आबाद रहे सदा 
चाहे मेरे शब् की सुबह  ना हो।