सब अनजाने हो गए
बड़े शहर को हम क्या निकले
अपने अफसाने हो गए ।
चांद , तारों के नीचे सोए
मुझे जमाने हो गए है ।
दादी नानी के बताए किस्से
अब पुराने हो गए है
गिल्ली डंडा , पतंग लट्टू,
मोबाइल में सब खो गए है ।
दोस्तों संग बैठ सुख दुख
बांट पाऊं,
इस इंतजार में सुख दुख
पुराने हो गए है ।।
प्रदीप देवानी ~ pd