ये कच्ची उम्र की मोहबत। . इतनी पक्की क्यों होती है
ना धर्म ना जात , ना रंग
ना उम्र का लिहाज़
उन आंसुओं की रंगत इतनी अच्छी क्यों होती है ,,
ना छुरी ना चाकू , न बन्दूक
फिर भी दिल पे वार ,उन कातिलों की सोहबत
इतनी सच्ची क्यों होती है
ये कच्ची उम्र की मोहबात .. इतनी पक्की क्यों होती है
ना वक्त , ना पैसा , ना राह ,
ना ही मंजिल का गुमान ,फिर भी सब कुछ पाने की,
कोशिश क्यों होती है ।
ये कच्ची उम्र की मोहबात .. इतनी पक्की क्यों होती है
उम्मीद , ख्वाब , और जज्बातों ,
के सहारे चलती है वो दुनिया ,
उसी उम्र में सच्ची मोहब्बत क्यों होती है ।
ये कच्ची उम्र की मोहबात .. इतनी पक्की क्यों होती है
प्रदीप देवानी ~pd
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