Friday, March 1, 2019

भूत और भविष्य

भूत और भविष्य  के द्वंद में  फँसा  हुआ
चल रहा हूँ  बिना रुके  बिना थके मगर कहाँ ?

भूत  तो चला गया छोड़ मुझको  राह में
भविष्य की महबूबा तो आती नहीं कभी हाथ  में

वर्तमान चल रहा है कंधे से कंधा मिला
क्यों नहीं  मानता मैं उसको मेरी दिलरुबा ?




जानता हूँ मैं ये की
वर्तमान सिर्फ संग है
वर्तमान ही मेरे  जीने की उमंग है


उलझ रहा है अपनी ही पतंग की डोर  में
रात दिन
माया के जंजाल  में  है बुरी तरह फसा हुआ 

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