Friday, May 14, 2021

राही

 घुमा बहुत इधर उधर 

ढूँढा उसको डगर डगर 

लगा वो ना मिल पाया तो

हो जाऊँगा तहस नहस -२  . 


फिर आखिर वो मिल ही गया 

जो सोचा था हो ही गया 

 सपना सच में बदला और  

मंजिल पे राही पहुँच  गया -२ 


पर ये जीवन तो आवारा था 

भवरें  का कहाँ ठिकाना था 

सोने के भी मिल  जाने पे 

उसे मिट्टी  ही कहलाना था -२ 


जो मिल गया उसकी  कदर कहाँ 

जो नहीं है उसका  रोना था 

दो पल भी कहाँ इस लालची को

 चैन और सुकून से सोना था -२ 


प्रदीप देवानी ~ pd





Tuesday, May 11, 2021

खून दान

ऑफिस में पहुँचते  ही मेरे बॉस ने मुझे अपनी केबिन में भुलाया और अपनी अकड़ वाली आवाज़ में कहना शरू किया 

रमेश आज तुम लेट आये हो ऑफिस , आधे दिन की  छुट्टी  लगा देना।

 मेरा दिमाग पहले ही गरम था , और १ घंटा देर से आने पर आधा दिन छुट्टी।  मैंने  भी गुस्से में बोल दिया पूरे दिन की लगा दूंगा  सर पर पहले आज का काम निपटा दूँ।  

बहार आकर अपनी कुर्सी पर बैठा ही था तो श्रद्धा मैडम आयी और  व्यंग्य करते हुए बोली ... क्या बात है रमेश बाबू प्रमोशन हो रहा है क्या सुबह सुबह बॉस ने केबिन में  बुलाया ?

मैं  चाह  कर भी उनकी उम्र का लिहाज़ कर उन पर गुस्सा न कर पाया और कहा रहने दीजिये मैडम पहले ही दिमाग गरम है आप और आग में घी मत डालिये। 

श्रद्धा मैडम ने हैरान हो कर  पुछा क्या हुआ  ?  बॉस ने डांटा ? आपके बाबूजी ने फिर से खर्चा कम करने को कहा  या फिर भाभी जी ने कोई नयी फरमाइश की है ?

मैंने कहा नहीं श्रद्धा मैडम ऐसा कुछ नहीं है..  सुबह जब  चाय पी रहा था तो  एक फ़ोन आया और कहा " रमेश  जी हमे  खून की जरूरत है आपका नंबर हमे ब्लड  आर्मी से मिला है क्या आप आ सकते है खून देने के लिए ?"

मैंने हॉस्पिटल का पता पुछा और जाने के लिए   एक बार में तैयार हो गया, ये सोच कर की किसी का भला हो जायेगा और मेरा पुण्य। 

हाँ रमेश बाबू ये तो भला हुआ आप किसी की मदद कर के आये है फिर इतने  उखड़े क्यों है  ?

अरे मैडम रहने दीजिये भलाई का ज़माना ही नहीं है , जिनके लिए ब्लड डोनेट करने गया था वो तो बहुत ही कृपण आदमी निकले ,चाय पानी पूछना तो दूर उनके मुँह से एक धन्यवाद् तक ना निकला मेरे खून के लिए। मैं ही पगलो की तरह अपनी ऑफिस को छोड़ वहां गया और यहाँ आया तो बॉस की डांट और मिली तोहफे में। 

श्रद्धा  मैडम  जी मेरी बात सुनकर हैरान तो हुई परन्तु उनके हाव भाव बता रहे थे की वो मेरी बात से सहमत नहीं थी। 

कुछ रूक कर बोली ....  रमेश बाबू  आप ब्लड डोनेट करने गए थे या ब्लड का व्यवसाय ?

मैंने अचंभित हो कर बोला   ये कैसा प्रश्न है मैडम ? डोनेट करने ही गया था। 

श्रद्धा मैडम बोली , लेंन देंन तो व्यवसाय में होता है रमेश बाबू , दान में नहीं।  आपको सारा सुख खून  देने में ही मिल जाना चाहिए था , फिर उसमें वापस पाने जैसा  कुछ नहीं था। दान केवल देने का नाम है रमेश बाबू वापस पाने का नहीं, तो अगली बार अगर कुछ पाने के लिए जाओ तो उसे ब्लड डोनेट करने जा रहा हूँ ऐसा मत बोलना। 

उस दिन श्रद्धा मैडम ने मुझे ज़िन्दगी का एक अहम सबक दे दिया , की दान में अगर मुझे देने में  सुख नहीं मिल रहा है और मैं उसके बदले कुछ पाना चाहता हूँ तो वो दान नहीं व्यवसाय है। 

 प्रदीप देवानी  ~ PD