Wednesday, December 27, 2017

भगवान के पास

अनुभव  "भगवान के पास "

पुणे से ८० मील  दूर  सह्याद्रि  की पहाड़ियों  में  तिकोना दुर्ग की चढाई करते समय

एक ३२ साल के पिता और ४,५ साल की बेटी के बीच हुआ एक वार्तालाप कब इतना मार्मिक और भावुक हो गया की बिना कहे ज़िन्दगी की सबसे पहली और कठिन सचाई से रुबरु करा गया

पापा : बेटा यहाँ शिवजी महाराज अपने साथियों के साथ रहते थे

युविका ( बेटी) : अब कहाँ गए शिवजी महाराज ? अब वो कहाँ रहते है ?

पापा : बेटा  वो अब "भगवान के पास " चले गए।

युविका : क्यों वो भगवान के पास क्यों चले गए ? अपना किला और अपना शहर छोड़ कर ?

पापा : बेटा  जब हम बूढ़े  हो जाते हैतोह हम भगवान के पास चले जाते है।

युविका : सब बूढ़े होने के बाद भगवान के पास चले जाते है क्या ?

पापा : हाँ बेटा  जैसे मेरी दादी चली गयी। .

युविका : पापा क्या आप भी जब बूढ़े  हो जाओगे तो भगवान के पास चले जाओगे ?

पापा: हाँ बेटा  मैं  भी चला जाऊँगा।

युविका ने मेरा हाथ जितनी जोर से पकड़ सकती थी उतनी जोर से पकड़ा उसकी  आँखों  से उसकी शरारत चली गयी थी और उसका स्थान ले लिया था कुछ आसूँ  की नमी और कुछ उसकी ज़िद्द ने ले ली

और फिर वो मुझे बोली। .

युविका : पापा मैं आपको नहीं जाने दूँगी  .. मैं भगवान जी को मना  कर दूँगी की मेरे पापा को मत ले जाओ

बोलो पापा आप नहीं जओगे ना प्लीज बोलो  ना पापा। .

मेरे पास ३५००  फ़ीट की उचाइये पे ट्रेकिंग करती हुए एक नन्हे से मन का हौसला बनाये रखने के लिए जीवन के सबसे पहले सत्य को असत्य बताने के सिवाए कोई चारा ना था। .

और मैंने बोला " नहीं जाऊँगा बेटा  मैं " भगवान  के पास " कभी नहीं जाऊँगा तुझे छोड़ के।