भूत और भविष्य के द्वंद में फँसा हुआ
चल रहा हूँ बिना रुके बिना थके मगर कहाँ ?
भूत तो चला गया छोड़ मुझको राह में
भविष्य की महबूबा तो आती नहीं कभी हाथ में
वर्तमान चल रहा है कंधे से कंधा मिला
क्यों नहीं मानता मैं उसको मेरी दिलरुबा ?
जानता हूँ मैं ये की
वर्तमान सिर्फ संग है
वर्तमान ही मेरे जीने की उमंग है
उलझ रहा है अपनी ही पतंग की डोर में
रात दिन
माया के जंजाल में है बुरी तरह फसा हुआ
चल रहा हूँ बिना रुके बिना थके मगर कहाँ ?
भूत तो चला गया छोड़ मुझको राह में
भविष्य की महबूबा तो आती नहीं कभी हाथ में
वर्तमान चल रहा है कंधे से कंधा मिला
क्यों नहीं मानता मैं उसको मेरी दिलरुबा ?
जानता हूँ मैं ये की
वर्तमान सिर्फ संग है
वर्तमान ही मेरे जीने की उमंग है
उलझ रहा है अपनी ही पतंग की डोर में
रात दिन
माया के जंजाल में है बुरी तरह फसा हुआ