वो पूछती है की इतने हैरान परेशान क्यों हो
एक पल को सोचा बताऊँ फिर टाल दिया
पर वो पढ़ लेती मेरे चहरे की शिकन को
और मेरी आँखों की हैरत को
जिक्र ना किया कुछ मैंने
मेरे ग़म - ए - शब् की बातों का
उस बात को क्यों छेड़ू मैं
जिस बात का कुछ हल ना हो
उस बात को क्यों छेड़ू मैं
जिस बात मे कुछ दम ना हो
तू आबाद रहे सदा
चाहे मेरे शब् की सुबह ना हो।