दावा था उनका की हम-साया बनके साथ
चलेंगे ज़िन्दगी भर।
कुछ दूरी तक चले भी वो मेरे साथ,
कुछ ख्वाहिशों में रंग भरे भी हमने साथ में,
खुशी के त्योहारों में फुलझड़ी की ,
तरह रोशनी बिखरी उन्होंने ।
फिर अचानक प्रकाश मुझसे रूठने लगा ,
जीवन में दुख के अँधेरे का आगमन हुआ
काली घटाओ के पास आते आते ,
हम साये पीछे हटते गए ,
अपनी परछायी भी पराई सी हो गई ।
ये अमावस्या की रात थी,
तारे काले बदलो में छुप गए थे
मैं अकेला ही था
मेरे हम साये और साथी
नहीं थे मेरे इर्द गिर्द।
मुझे पता था इस रात की भी सुबह होगी,
फिर मेरे कुछ साये और साथी होंगे,
बस इस बार मुझे पता होगा की ,
वो मेरे नहीं उगते सूरज के साथी है !!!
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