Friday, October 7, 2022

खामोशी

शब्द गुम है , कलम से स्याही है रूठी हुई,
क्या लिखूं और क्या कहूं जब जान है अटकी हुई।

मेहबूब ,बेवफा,दोस्त और रकीब सब गायब हुए ,
जाम है आधा ,मदिरा भी अब प्यासी हुई ।

कोरे कागज और खामोशी को समझना हो तो आ ,
गजल और शाम की बाते अब जूनी हुई ।।

प्रदीप देवानी ~pd

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