Friday, May 14, 2021

राही

 घुमा बहुत इधर उधर 

ढूँढा उसको डगर डगर 

लगा वो ना मिल पाया तो

हो जाऊँगा तहस नहस -२  . 


फिर आखिर वो मिल ही गया 

जो सोचा था हो ही गया 

 सपना सच में बदला और  

मंजिल पे राही पहुँच  गया -२ 


पर ये जीवन तो आवारा था 

भवरें  का कहाँ ठिकाना था 

सोने के भी मिल  जाने पे 

उसे मिट्टी  ही कहलाना था -२ 


जो मिल गया उसकी  कदर कहाँ 

जो नहीं है उसका  रोना था 

दो पल भी कहाँ इस लालची को

 चैन और सुकून से सोना था -२ 


प्रदीप देवानी ~ pd





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