घुमा बहुत इधर उधर
ढूँढा उसको डगर डगर
लगा वो ना मिल पाया तो
हो जाऊँगा तहस नहस -२ .
फिर आखिर वो मिल ही गया
जो सोचा था हो ही गया
सपना सच में बदला और
मंजिल पे राही पहुँच गया -२
पर ये जीवन तो आवारा था
भवरें का कहाँ ठिकाना था
सोने के भी मिल जाने पे
उसे मिट्टी ही कहलाना था -२
जो मिल गया उसकी कदर कहाँ
जो नहीं है उसका रोना था
दो पल भी कहाँ इस लालची को
चैन और सुकून से सोना था -२
प्रदीप देवानी ~ pd
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