हर दिन थोड़ा थोड़ा कर के बदला तूने मुझे
और फिर जब मैं काम का ना रहा
तो अपने घर से निकाल फेका मुझे
माना तू बेवफा नहीं
ये सब वक़्त का कसूर था
अब मैं वो कहाँ था
जिस पे तुझे गुरुर था
ना पूर्णिमा थी मेरी
ना ही मेरी अमावस्या थी
सब बदल गया था अब
ना दिवाली थी ना ईद थी
सूरज और चाँद के
ढंग अब कुछ और थे
मैं कहाँ रहा था मैं
ये रंग कुछ और थे। ...
उपरोक्त पंक्तिया एक कैलेंडर द्वारा वर्ष के अंत में कही गयी है।
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