Monday, November 2, 2020

ना दिवाली थी ना ईद थी

 हर दिन थोड़ा थोड़ा कर के बदला तूने मुझे 

और फिर जब मैं काम का ना रहा 

तो अपने घर से निकाल फेका मुझे 

माना तू बेवफा नहीं 

ये सब वक़्त का कसूर था 

अब मैं वो कहाँ था 

जिस पे तुझे गुरुर था 

ना पूर्णिमा थी मेरी 

ना ही मेरी अमावस्या थी 

सब बदल गया था अब 

ना दिवाली थी  ना ईद थी 

सूरज और चाँद के 

ढंग अब कुछ और थे 

मैं कहाँ रहा था मैं 

ये रंग कुछ और थे। ... 


उपरोक्त पंक्तिया एक कैलेंडर द्वारा वर्ष के अंत में कही गयी है। 

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