जिस तरह उग्ग आते है बारिशों में पौधे
बिना खाद , माली और देखभाल के ...
बस उसी तरह प्यार का अंकुर भी खिल उठता है
बिना किसी शर्त ,उम्मीद और तर्क के .
जिस तरह समां जाती है नदी
अपना सारा संघर्ष पीछे छोड़ कर सागर में
उसी तरह मेरा मैं भी छूट जाता है और समा
जाता है तुझ मैं.
प्रदीप देवांनी ~pd
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