आईना देखु तो एक शख्श
नज़र आता है
बेपता , बेहोश , लावारिस
खुद को पाता है ।
अपनी ग़ुरबत में इतना खोया है ,
प्यार से भी उसको खौफ आता है।
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भूत और भविष्य में इतना उलझा है ,
वर्तमान देख के अब वो घबराता है ।
,,,,
मोह और माया में खुदी उलझा है ,
खुदा में कहाँ उसको अब रस आता है
आईना ....
चलता रहता है , गली गली , शहर शहर ,
मंजिलों को कहा कभी भी वो पता है ।
आईना ....
प्रदीfप देवानी ~ pd
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